इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय, ‘कर्मसंन्यासयोग’, पर केंद्रित है। इस अध्याय में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग (निष्काम कर्म) और कर्मसंन्यास (सांख्ययोग) के बीच तुलना करते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि दोनों ही मार्ग कल्याणकारी हैं, परंतु कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग अधिक सुगम और श्रेष्ठ है। वे बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की आकांक्षा, और जो अपने सभी कर्मों को ब्रह्म को अर्पित कर देता है। यह अध्याय कर्म और ज्ञान के समन्वय का सुंदर प्रतिपादन करता है।
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