इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“ध्वन्यालोकः” 9वीं शताब्दी के आचार्य आनंदवर्धन द्वारा रचित भारतीय काव्यशास्त्र का एक क्रांतिकारी ग्रंथ है। इस कृति ने पहली बार ‘ध्वनि’ को काव्य की आत्मा के रूप में स्थापित किया। आनंदवर्धन ने तर्क दिया कि काव्य का सबसे उत्कृष्ट सौंदर्य उसके वाच्यार्थ (literal meaning) या लक्ष्यार्थ (metaphorical meaning) में नहीं, बल्कि उसके व्यंग्यार्थ या ‘ध्वनित’ होने वाले अर्थ में निहित होता है। उन्होंने ध्वनि के विभिन्न भेदों (जैसे- रस-ध्वनि, अलंकार-ध्वनि) का विस्तृत विवेचन किया और यह सिद्ध किया कि रस की अनुभूति ध्वनि के माध्यम से ही होती है। इस ग्रंथ ने भारतीय काव्य-चिंतन को एक नई दिशा दी और इसका प्रभाव आज तक बना हुआ है।
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