इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक भारतीय काव्यशास्त्र और दर्शन की दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं – ‘रस’ और ‘आनन्द’ – के अंतर्संबंध पर एक गहन विवेचना हो सकती है। ‘रस’ का संबंध कला, विशेषकर काव्य और नाटक, से प्राप्त होने वाली सौंदर्यपरक और भावनात्मक अनुभूति से है, जबकि ‘आनन्द’ एक गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक अवस्था है, जिसे आत्मा का सहज स्वरूप (ब्रह्मानंद) माना जाता है। इस कृति में लेखक ने यह पड़ताल की होगी कि क्या काव्यानुभूति से मिलने वाला ‘रस’ उस परम ‘आनन्द’ का ही एक लौकिक प्रतिबिंब है। यह साहित्य, सौंदर्यशास्त्र और वेदांत के अध्येताओं के लिए एक रोचक विषय है, जो कला और अध्यात्म के बीच के सेतु को समझने का प्रयास करता है।
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