इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“सरस्वतीविलासः” विजयनगर साम्राज्य के दौर में रचा गया धर्मशास्त्र का एक महत्वपूर्ण निबंध-ग्रंथ है। ‘विलास’ का अर्थ है ‘विस्तार’ या ‘प्रकटीकरण’, और यह ग्रंथ धर्म-रूपी सरस्वती का विस्तार प्रस्तुत करता है। यह हिंदू कानून (व्यवहार) पर एक प्रामाणिक कृति मानी जाती है, विशेषकर विरासत (दायभाग) के नियमों के लिए। इसमें विभिन्न स्मृतियों और उनके भाष्यों के आधार पर हिंदू सामाजिक और कानूनी आचार-विचारों को एक व्यवस्थित रूप में संकलित किया गया है। यह ग्रंथ उस समय के सामाजिक-धार्मिक जीवन को समझने और हिंदू कानून के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करने के लिए एक मूल्यवान स्रोत है, विशेषकर दक्षिण भारत के संदर्भ में।
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