इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“श्री चतुर्विंशतिजिनस्तवः” का अर्थ है “चौबीस जिनेश्वरों (तीर्थंकरों) की स्तुति”। यह जैन धर्म का एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र-ग्रंथ है, जिसमें वर्तमान अवसर्पिणी काल के सभी चौबीस तीर्थंकरों – भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर तक – का गुणगान किया गया है। इस स्तोत्र में प्रत्येक तीर्थंकर के नाम, उनके चिन्ह, और उनके प्रमुख कल्याणकारी गुणों की वंदना की गई है। इसका पाठ करने से भक्तों को सभी चौबीस तीर्थंकरों का एक साथ स्मरण करने का पुण्य प्राप्त होता है और उनके मन में भक्ति तथा वैराग्य का भाव जाग्रत होता है। यह जैन अनुयायियों के दैनिक पूजा-पाठ और स्वाध्याय का एक महत्वपूर्ण अंग है।
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