इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“वीरमित्रोदय” 17वीं सदी के विद्वान मित्र मिश्र द्वारा रचित धर्मशास्त्र का एक विशाल और विश्वकोशीय निबंध-ग्रंथ है। यह विभिन्न ‘प्रकाशों’ (अध्यायों) में विभाजित है। प्रस्तुत पुस्तक इस ग्रंथ का बारहवाँ भाग, “शुद्धि प्रकाश”, है। यह खंड ‘शुद्धि’ के विषय पर केंद्रित है, जिसमें जन्म और मृत्यु के अवसर पर लगने वाले ‘आशौच’ (सूतक) के नियमों, विभिन्न प्रकार की अशुद्धियों और उनके निवारण के लिए किए जाने वाले प्रायश्चितों का विस्तृत और प्रामाणिक विवेचन है। यह विभिन्न स्मृतियों और पुराणों के मतों का समन्वय करते हुए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह धर्मशास्त्र के गंभीर अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ है।
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