इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक साहित्यिक आलोचना की पुस्तक है जो हिंदी कविता के दो महत्वपूर्ण आंदोलनों – ‘छायावाद’ और ‘रहस्यवाद’ – के बीच के संबंधों और अंतरों का विश्लेषण करती है। इसमें जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा जैसे प्रमुख छायावादी कवियों की रचनाओं में पाए जाने वाले रहस्यवादी तत्वों की पड़ताल की गई है। यह कृति यह समझने का प्रयास करती है कि छायावाद का प्रकृति-प्रेम और व्यक्तिवाद कैसे आध्यात्मिक और रहस्यवादी अनुभूतियों में बदल जाता है।
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