इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेन्द्र कुमार की कहानियों के संग्रह का दूसरा भाग है। जैनेन्द्र की कहानियाँ बाहरी घटनाओं से अधिक पात्रों के आंतरिक मन के द्वंद्व, उनकी नैतिक दुविधाओं और दार्शनिक प्रश्नों पर केंद्रित होती हैं। ‘पाजेब’, ‘खेल’, ‘अपना-अपना भाग्य’ जैसी उनकी कहानियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। यह संग्रह पाठकों को एक ऐसे महान कथाकार की दुनिया में ले जाता है, जिन्होंने मानव-मन की गहराइयों को अपनी लेखनी से छुआ।
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