इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक साहित्यिक आलोचना पर आधारित शोध ग्रंथ है। इसमें हिंदी के महान नाटककार जयशंकर प्रसाद की ‘नाट्य कला’ का एक तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। यह पुस्तक विश्लेषण करती है कि प्रसाद के नाटकों पर ‘भारतीय’ नाट्यशास्त्र (भरतमुनि की परंपरा) और ‘पाश्चात्य’ नाट्य परंपरा (शेक्सपियर आदि) का कितना और किस प्रकार का प्रभाव पड़ा। यह प्रसाद की उस अनूठी शैली की पड़ताल करती है जिसमें उन्होंने दोनों परंपराओं का समन्वय किया।
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