इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
स्वामी कार्तिकेय द्वारा रचित ‘कार्तिकेयानुप्रेक्षा’ या ‘द्वादशानुप्रेशा’ जैन वैराग्य साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें बारह अनुप्रेक्षाओं (भावनाओं) का सुंदर और काव्यात्मक वर्णन है। ये बारह भावनाएं हैं – अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म। इन भावनाओं का बार-बार चिंतन करने से साधक को संसार के प्रति वैराग्य और आत्म-ज्ञान के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है। यह ग्रंथ प्राकृत गाथाओं में है और मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा स्रोत माना जाता है।
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