इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
जिनवाणी’ का अर्थ है ‘जिन (तीर्थंकर) की वाणी’। यह जैन धर्म के शास्त्रों और उपदेशों के लिए एक सम्मानजनक शब्द है। यह पुस्तक ‘जिनवाणी’ का एक सार-संग्रह हो सकती है, जिसमें जैन आगमों और प्रमुख आचार्यों की रचनाओं से चुने हुए अंश, सूक्तियाँ और शिक्षाएँ शामिल हैं। इसका उद्देश्य पाठकों को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, जैसे अहिंसा, अनेकांतवाद, और अपरिग्रह, से सरल और सुलभ रूप में परिचित कराना है।
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