इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
चिंता’ शीर्षक वाली यह पुस्तक संभवतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध मनोविकार संबंधी निबंधों में से एक का विस्तृत रूप या उसी विषय पर आधारित एक कृति हो सकती है। यह पुस्तक ‘चिंता’ नामक मानवीय भावना का मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें चिंता के स्वरूप, उसके कारणों और व्यक्ति के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की गहन विवेचना की गई है। लेखक चिंता और भय के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए यह बताते हैं कि कैसे भविष्य की अनिश्चितता और किसी अनिष्ट की आशंका इस मनोविकार को जन्म देती है। यह कृति साहित्यिक निबंध शैली में मानवीय मन की जटिलताओं को समझने का एक उत्कृष्ट प्रयास है।
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