इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
कविकंठाभरण’ 11वीं सदी के कश्मीरी कवि क्षेमेन्द्र द्वारा रचित काव्यशास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जैसा कि शीर्षक से संकेत मिलता है, यह ‘कवियों के गले का आभूषण’ है, जिसका उद्देश्य aspiring कवियों को काव्य-रचना की कला में निपुण बनाना है। इस ग्रंथ में कवि बनने के लिए आवश्यक गुणों, अभ्यास की विधियों, और काव्य के विभिन्न दोषों और गुणों की चर्चा की गई है। क्षेमेन्द्र ने इसमें 100 से अधिक कवियों के उदाहरण देते हुए अपनी बात को स्पष्ट किया है। यह केवल एक सैद्धांतिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका है जो नए कवियों को काव्य-कला की बारीकियों को सिखाती है। यह संस्कृत काव्यशास्त्र परंपरा में एक अनूठी और महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
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