इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“वरिवस्यारहस्यम्” श्रीविद्या साधना परंपरा का एक महत्वपूर्ण और गूढ़ ग्रंथ है, जिसकी रचना प्रसिद्ध तांत्रिक साधक भास्करराय माखिन् ने की है। ‘वरिवस्या’ का अर्थ है ‘उपासना’ या ‘सेवा’, और यह पुस्तक श्रीचक्र और देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना के रहस्यों को उजागर करती है। इसमें श्रीचक्र के निर्माण, उसके प्रतीकों, विभिन्न आवरणों की देवियों और उनके मंत्रों का विस्तृत तांत्रिक और दार्शनिक विवेचन किया गया है। यह कृति केवल कर्मकांड का विधान नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत के परिप्रेक्ष्य में श्रीविद्या साधना के अंतिम लक्ष्य, यानी साधक और देवी की एकता, को भी समझाती है। यह तंत्र के उच्च साधकों के लिए एक अनिवार्य ग्रंथ है।
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