इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“श्री बाल मनोरमा” भट्टोजि दीक्षित के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ “सिद्धान्त कौमुदी” की एक अत्यंत विस्तृत और पाण्डित्यपूर्ण टीका है, जिसके रचयिता वासुदेव दीक्षित हैं। यह सोलहवां भाग इस विशाल टीका-ग्रंथ की श्रृंखला की एक कड़ी है, जिसमें व्याकरण के किसी विशिष्ट प्रकरण, जैसे कारक, समास या तिङन्त, के सूत्रों की गहन व्याख्या की गई है। ‘बाल मनोरमा’ का अर्थ है ‘बच्चों (शुरुआती छात्रों) का मनोरंजन करने वाली’, लेकिन वास्तव में यह व्याकरण शास्त्र के उच्चतम स्तर के विद्वानों के लिए लिखी गई है। यह सूत्रों के प्रत्येक पद का विश्लेषण करती है, विभिन्न मतों की समीक्षा करती है और जटिल शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करती है।
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