इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“वीर-सतसई” प्रसिद्ध हिंदी कवि सूर्यमल्ल मीसण (या मिश्रण) द्वारा रचित डिंगल (राजस्थानी) भाषा का एक कालजयी वीर-रस प्रधान काव्य है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें लगभग सात सौ (सतसई) दोहे हैं, जिनमें वीरों के शौर्य, पराक्रम, बलिदान और स्वाभिमान का ओजस्वी वर्णन है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में रचित यह काव्य, सोए हुए भारतीय समाज में वीरता की भावना जगाने का आह्वान करता है। कवि ने ऐतिहासिक और काल्पनिक प्रसंगों के माध्यम से एक वीर पुरुष के आदर्शों को प्रस्तुत किया है। अपनी सशक्त भाषा और वीर-भावना के सजीव चित्रण के कारण यह हिंदी साहित्य में एक अद्वितीय स्थान रखता है।
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