इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“आर्यमन्तव्यप्रकाश द्वितीय भाग” आर्य समाज के सिद्धांतों और मान्यताओं पर प्रकाश डालने वाली एक कृति का दूसरा खंड है। यह पुस्तक महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा प्रतिपादित वैदिक विचारधारा का समर्थन और प्रचार करती है। इस खंड में संभवतः मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बाल विवाह, और जाति व्यवस्था जैसे विषयों पर आर्य समाज के दृष्टिकोण का विस्तृत खंडन-मंडन प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य वेदों को ही एकमात्र प्रामाणिक और सर्वोच्च धर्मग्रंथ के रूप में स्थापित करना और समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों का तार्किक रूप से निवारण करना है। यह कृति आर्य समाज के अनुयायियों और वैदिक धर्म के अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है।
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