इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक प्रतीकात्मक और संभवतः एक सामाजिक-धार्मिक उपन्यास या नाटक है। ‘अघमर्षण’ का अर्थ है पाप का नाश करने वाला, और ‘द्विजराज’ का अर्थ है ब्राह्मणों में श्रेष्ठ या चंद्रमा। यह कृति किसी ऐसे नायक की कहानी हो सकती है जो समाज में व्याप्त पाप और भ्रष्टाचार का नाश करने के लिए संघर्ष करता है। यह वैदिक आदर्शों और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना पर जोर देने वाली एक सुधारवादी रचना हो सकती है।
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