इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक हिंदी के ‘अष्टछाप’ कवियों और तेलुगु के ‘ताल्लपाक’ कवियों के साहित्य का एक तुलनात्मक अध्ययन है। अष्टछाप कवि (जैसे सूरदास, नंददास) वल्लभाचार्य के शिष्य थे और कृष्ण भक्ति की सगुण धारा के प्रमुख स्तंभ थे। इसी प्रकार, ताल्लपाक कवि (जैसे అన్నमाचार्य) भी वैष्णव भक्त थे और उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर की स्तुति में हजारों पद लिखे। यह ग्रंथ इन दोनों महान काव्य परंपराओं के बीच समानताओं और अंतरों की खोज करता है। इसमें उनके भक्ति-दर्शन, काव्य-शैली, भाषा और संगीत के तत्वों का विश्लेषण किया गया है। यह भक्ति साहित्य और तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
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