इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभ में हिंदी साहित्य के क्षेत्र में हुए एक महत्त्वपूर्ण भाषाई विवाद पर केंद्रित है। उस समय यह बहस चल रही थी कि हिंदी काव्य की भाषा परंपरागत रूप से चली आ रही ब्रजभाषा होनी चाहिए या गद्य में स्थापित हो चुकी खड़ी बोली। इस कृति में इस विवाद के ऐतिहासिक संदर्भ, दोनों भाषाओं के पक्ष और विपक्ष में दिए गए तर्कों, और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे सुधारकों की भूमिका का विश्लेषण किया गया होगा, जिनके प्रयासों से अंततः खड़ी बोली काव्य की भी मुख्य भाषा बन गई।
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