इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक भारतीय साहित्य की छंद-शास्त्र परंपरा पर एक गहन और विद्वत्तापूर्ण अध्ययन प्रस्तुत करती है। ‘छन्दस’ या छंद-शास्त्र वेदों के छह वेदांगों में से एक है, जो काव्य के लयबद्ध और संगीतमय स्वरूप का निर्धारण करता है। इस प्रथम भाग में संभवतः वैदिक छंदों (जैसे- गायत्री, अनुष्टुप्) की उत्पत्ति, उनके स्वरूप और उनके विकास-यात्रा से लेकर लौकिक संस्कृत के प्रमुख छंदों (जैसे- शिखरिणी, मंदाक्रांता) तक की परंपरा का विश्लेषण किया गया है। इसमें पिंगल के ‘छंदशास्त्र’ जैसे प्रमुख ग्रंथों और उनके भाष्यकारों के योगदान की भी चर्चा हो सकती है। यह संस्कृत और काव्यशास्त्र के अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है।
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