इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
भगवतीचरण वर्मा का यह कालजयी उपन्यास ‘पाप और पुण्य’ की अवधारणा पर एक गहन दार्शनिक प्रश्न उठाता है। कहानी महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्यों, श्वेतांक और विशालदेव, के माध्यम से आगे बढ़ती है, जिन्हें पाप और पुण्य का रहस्य जानने के लिए क्रमशः भोग-विलास में डूबे सामंत बीजगुप्त और परम त्यागी योगी कुमारगिरि की शरण में भेजा जाता है। दोनों के जीवन के केंद्र में पाटलिपुत्र की प्रसिद्ध नर्तकी चित्रलेखा है, जो सौंदर्य, प्रेम और विवेक का प्रतीक है। उपन्यास इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि संसार में पाप या पुण्य कुछ भी निरपेक्ष नहीं है; यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण और परिस्थितियों का परिणाम है। हम वही करते हैं जो हमें करना पड़ता है।
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