इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक गंभीर और विद्वत्तापूर्ण पुस्तक है जो हिंदू धर्मशास्त्रों में ‘दान’ और ‘उत्सर्ग’ की अवधारणा का विश्लेषण करती है। ‘दान’ का अर्थ है किसी वस्तु से अपना अधिकार समाप्त कर दूसरे का अधिकार स्थापित करना, जबकि ‘उत्सर्ग’ का अर्थ है किसी वस्तु पर से केवल अपना अधिकार त्याग देना (जैसे- तालाब खुदवाकर सर्व-साधारण के लिए छोड़ देना)। इस पुस्तक में धर्मसूत्रों, स्मृतियों और पुराणों के आधार पर इन दोनों कर्मों के बीच के सूक्ष्म अंतर, उनके प्रकार, दान देने के नियम, योग्य और अयोग्य पात्र, और उनसे प्राप्त होने वाले लौकिक तथा पारलौकिक फलों की विस्तृत विवेचना की गई होगी। यह हिंदू सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है।
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