इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“देवीकालोत्तरागमः” शैव आगम साहित्य का एक महत्वपूर्ण तांत्रिक ग्रंथ है। आगम ग्रंथ वे शास्त्र हैं जिनमें शिव और शक्ति की पूजा, दर्शन, और साधना पद्धतियों का विस्तृत वर्णन होता है। यह विशेष आगम ‘उत्तर’ आगम है, जिसका अर्थ है कि यह ज्ञान और दर्शन के उच्चतर पहलुओं पर केंद्रित है। “देवीकालोत्तर” का संबंध समय (काल) से परे की देवी या चेतना से हो सकता है। इस कृति में संभवतः शैव सिद्धांत के गूढ़ दार्शनिक तत्वों, कुंडलिनी योग, मंत्रों के रहस्य, और मोक्ष प्राप्ति के तांत्रिक साधनों की विस्तृत विवेचना की गई है। यह तंत्र और शैव दर्शन के उन्नत साधकों और विद्वानों के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
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