इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“गीता ज्ञान यज्ञ” शीर्षक यह दर्शाता है कि यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को एक ‘यज्ञ’ के रूप में प्रस्तुत करती है। जिस प्रकार यज्ञ में आहुति देकर देवताओं को प्रसन्न किया जाता है, उसी प्रकार इस पुस्तक में गीता के ज्ञान पर चिंतन-मनन रूपी आहुति देकर आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जाता है। यह संभवतः किसी प्रसिद्ध संत या विद्वान द्वारा गीता पर दिए गए प्रवचनों की श्रृंखला का संकलन हो सकता है। इसमें गीता के श्लोकों की केवल शाब्दिक व्याख्या नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक और आध्यात्मिक महत्व को यज्ञ की भावना से, यानी निस्वार्थ भाव से, जीवन में उतारने पर बल दिया गया होगा।
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