इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“गोपीगीत” श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का एक अत्यंत मार्मिक और भक्तिपूर्ण प्रसंग है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के महारास के दौरान उनके अंतर्धान हो जाने पर गोपियों द्वारा गाए गए विरह-गीतों का संग्रह है। ये उन्नीस श्लोक विरह-वेदना और प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं। गोपियाँ कृष्ण के गुणों, उनकी लीलाओं का स्मरण करती हैं और उनसे पुनः प्रकट होने की व्याकुल प्रार्थना करती हैं। यह केवल एक विरह-गीत नहीं, बल्कि जीव का परमात्मा से बिछड़ जाने की पीड़ा और उससे मिलने की तीव्र लालसा का एक गहन आध्यात्मिक प्रतीक है। यह वैष्णव भक्ति साहित्य में प्रेम और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
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