इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“गोत्रप्रवरभास्करः” हिंदू सामाजिक संरचना के दो महत्वपूर्ण स्तंभों – ‘गोत्र’ और ‘प्रवर’ – पर एक विस्तृत और प्रामाणिक ग्रंथ है। ‘गोत्र’ का संबंध एक व्यक्ति के किसी वैदिक ऋषि से पितृवंशीय वंश-परंपरा से है, जबकि ‘प्रवर’ उस गोत्र के अंतर्गत आने वाले प्रमुख ऋषियों की सूची है। यह ग्रंथ (‘भास्कर’ अर्थात् सूर्य) इस जटिल विषय पर प्रकाश डालता है। इसमें विभिन्न गोत्रों की उत्पत्ति, उनके प्रवर, और विवाह-संबंधों में सगोत्र और सप्रवर के निषेध जैसे नियमों की धर्मशास्त्रीय विवेचना की गई होगी। यह समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों और अपनी वंश-परंपरा को समझने में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ है।
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