इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“जैनविद्या” एक शोध-पत्रिका या अकादमिक जर्नल का नाम प्रतीत होता है, जो जैन धर्म, दर्शन, साहित्य और इतिहास के अध्ययन पर केंद्रित है। यह उसका अप्रैल 1984 का अंक है। इस अंक में जैन विद्या के विभिन्न पहलुओं पर विद्वानों द्वारा लिखे गए शोध-पत्र और लेख शामिल होंगे। विषय-वस्तु में जैन आगमों का विश्लेषण, जैन दर्शन के सिद्धांतों (जैसे- अनेकांतवाद, स्याद्वाद) पर चर्चा, प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य का अध्ययन, या जैन पुरातत्व और कला पर लेख हो सकते हैं। यह पत्रिका जैनोलॉजी (Jainology) के क्षेत्र में हो रहे शोध और चिंतन को प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण मंच है।
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