इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
पदवाक्यरत्नाकर’ भारतीय दर्शन, विशेषकर न्याय-वैशेषिक या व्याकरण दर्शन की परंपरा का एक ग्रंथ हो सकता है। शीर्षक (‘पद’, ‘वाक्य’ और ‘रत्नाकर’ अर्थात रत्नों का सागर) से यह प्रतीत होता है कि यह शब्दों (पद) और वाक्यों (वाक्य) के अर्थ, उनके संबंध और भाषा के दार्शनिक पहलुओं पर एक गहन विवेचन है। इस कृति में शब्द-शक्ति (अभिधा, लक्षणा, व्यंजना), वाक्य-स्फोट का सिद्धांत, या पदों और पदार्थों के बीच संबंध जैसे विषयों का विश्लेषण किया गया होगा। यह भाषा-दर्शन (philosophy of language) के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय कृति हो सकती है।
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