इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
पञ्चविंशति’ का अर्थ है ‘पच्चीस’। यह आचार्य पद्मनन्दि द्वारा रचित एक जैन ग्रंथ है, जिसमें पच्चीस अलग-अलग छोटे-छोटे प्रकरण या अध्याय हैं, जिन्हें ‘पञ्चविंशतिका’ कहा जाता है। प्रत्येक प्रकरण श्रावकाचार और मुनि-आचार के किसी एक विशिष्ट विषय पर प्रकाश डालता है। यह जैन आचार-शास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो धर्म के विभिन्न पहलुओं पर सारगर्भित और व्यवस्थित मार्गदर्शन प्रदान करता है।
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