इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
परिभाषेंदु शेखर’ संस्कृत व्याकरण के नव्य-व्याकरण परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रौढ़ ग्रंथ है, जिसकी रचना 18वीं सदी के महान वैयाकरण नागेश भट्ट ने की थी। यह पाणिनीय व्याकरण की ‘परिभाषाओं’ पर एक विस्तृत टीका है। ‘परिभाषाएँ’ वे नियम हैं जो अन्य व्याकरणिक सूत्रों के सही अनुप्रयोग के क्षेत्र को निर्धारित करते हैं। नागेश भट्ट ने इस ग्रंथ में इन परिभाषाओं के अर्थ, उनकी आवश्यकता और उनके परस्पर संबंधों का गहन तार्किक विश्लेषण किया है। यह ग्रंथ व्याकरण के सिद्धांतों की बहुत ही सूक्ष्म और गहरी समझ प्रस्तुत करता है और इसे व्याकरण शास्त्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए अनिवार्य माना जाता है।
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