इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी द्वारा रचित यह एक महत्वपूर्ण कृति है जो ‘प्राकृत’ भाषा के अध्ययन के लिए है। प्राकृत, संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, और जैन आगमों की प्रमुख भाषा रही है। इस पुस्तक के दो भाग हैं: “प्राकृत रचना भास्कर” में प्राकृत भाषा के व्याकरण और वाक्य-रचना के नियमों को समझाया गया है, ताकि छात्र इस भाषा में लिखना सीख सकें। “प्राकृत शब्दकोश” भाग में प्राकृत शब्दों के हिंदी अर्थ दिए गए हैं। यह जैन शास्त्रों और प्राचीन भारतीय भाषा विज्ञान के अध्येताओं के लिए एक अत्यंत उपयोगी और व्यावहारिक ग्रंथ है।
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