इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह जैन धर्म के एक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान ‘प्रतिक्रमण’ से संबंधित एक विशेष शब्दकोश है। ‘प्रतिक्रमण’ का अर्थ है ‘पीछे लौटना’, अर्थात अपने पापों और गलतियों का पश्चाताप करना और उनसे पीछे हटना। ‘प्रतिक्रमणत्रय’ का अर्थ हो सकता है सुबह, शाम और पाक्षिक (या वार्षिक) किए जाने वाले तीन प्रकार के प्रतिक्रमण। यह शब्दकोश प्रतिक्रमण सूत्रों में आने वाले प्राकृत और संस्कृत के विशिष्ट शब्दों, अवधारणाओं और प्रक्रियाओं की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है, ताकि साधक इस अनुष्ठान को सही अर्थ और भाव के साथ संपन्न कर सकें।
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