इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह 13वीं सदी के महान जैन आचार्य पंडित आशाधर द्वारा रचित ‘सागारधर्मामृत’ का दूसरा भाग है। यह ग्रंथ जैन ‘सागार’ यानी श्रावकों (गृहस्थों) के ‘धर्म’ का ‘अमृत’ है। इसमें एक गृहस्थ के लिए आवश्यक व्रतों, कर्तव्यों, और नैतिक आचरण का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक विवेचन है। यह दूसरा खंड उसी चर्चा को आगे बढ़ाता है और जैन गृहस्थ के जीवन को अनुशासित करने के लिए एक मानक ग्रंथ माना जाता है।
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