इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“सन्नुति” का अर्थ है “उत्तम स्तुति” या “सच्ची प्रशंसा”। यह एक भक्तिपूर्ण काव्य या स्तोत्र-संग्रह हो सकता है, जिसमें किसी इष्ट देव, गुरु या किसी महान सिद्धांत की श्रद्धापूर्वक स्तुति की गई हो। यदि यह जैन परंपरा में है, तो यह किसी तीर्थंकर या आचार्य की स्तुति हो सकती है। यदि यह वैष्णव परंपरा में है, तो यह विष्णु या कृष्ण की स्तुति हो सकती है। शीर्षक यह दर्शाता है कि यह केवल एक औपचारिक प्रशंसा नहीं, बल्कि हृदय से निकली हुई सच्ची और निर्मल भक्ति की अभिव्यक्ति है। यह कृति पाठकों को भक्ति-रस में डुबोने और उनके मन में अपने आराध्य के प्रति प्रेम और सम्मान को गहरा करने का एक माध्यम है।
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