इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह जैन धर्म के श्वेतांबर आगम साहित्य के बारह अंगों में से दूसरे अंग, ‘सूयगडांग सूत्र’ (सूत्रकृतांग सूत्र) का दूसरा भाग है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसमें जैन साधुओं के आचार-विचार, परीषहों को सहन करने और स्वाध्याय में लगे रहने का वर्णन है। इसके अलावा, इसमें अन्य समकालीन दार्शनिक मतों (जैसे क्रियावाद, अक्रियावाद) का खंडन और जैन सिद्धांतों की स्थापना की गई है। यह जैन दर्शन और साधु-आचार का एक गहन अध्ययन है।
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