इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक जैन धर्म में की जाने वाली एक आवश्यक दैनिक क्रिया ‘प्रतिक्रमण’ में प्रयुक्त होने वाले ‘सूत्रों’ का संग्रह है। प्रतिक्रमण का अर्थ है अपने द्वारा किए गए पापों और गलतियों का पश्चाताप करना और भविष्य में उन्हें न दोहराने का संकल्प लेना। इस पुस्तक में सामायिक, चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति, और पापों की आलोचना से संबंधित सभी आवश्यक सूत्रों को संकलित किया गया है, ताकि श्रावक-श्राविका विधिपूर्वक अपनी साधना कर सकें।
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