इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह ग्रंथ आर्य समाज की परंपरा में एक महत्वपूर्ण कृति हो सकता है। शीर्षक “सूर्यप्रकाश” संभवतः ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है, और ‘परीक्षा’ यह दर्शाती है कि इसमें विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक मान्यताओं की तर्क और वेद-प्रमाण की कसौटी पर परीक्षा की गई है। यह “सत्यार्थ प्रकाश” की शैली में, अन्य मत-पंथों के सिद्धांतों का खंडन और वैदिक सिद्धांतों का मंडन करने वाला एक शास्त्रार्थ-ग्रंथ हो सकता है। यह चौथा भाग, श्रृंखला के किसी विशिष्ट विषय पर केंद्रित होगा, जैसे- मूर्तिपूजा की समीक्षा या पौराणिक कथाओं का विश्लेषण। यह आर्य समाजी विद्वानों और अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक कृति है।
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