इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“तंत्रसमुच्चय” केरल की तांत्रिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसकी रचना 15वीं शताब्दी में चेन्नास नारायणन नम्बूदिरीपाद ने की थी। यह ग्रंथ मंदिरों में मूर्ति-स्थापना, पूजा-विधि, और उत्सवों के अनुष्ठान के लिए एक विस्तृत और व्यवस्थित संहिता (manual) है। इसमें मंदिर के वास्तुशिल्प से लेकर मूर्तियों के निर्माण, प्राण-प्रतिष्ठा, और दैनिक, मासिक तथा वार्षिक पूजाओं की प्रत्येक क्रिया का सूक्ष्मता से वर्णन है। यह दूसरा ‘सम्पुट’ या खंड है, जो संभवतः ग्रंथ के किसी मध्यवर्ती विषय, जैसे विभिन्न देवताओं की पूजा के विशिष्ट विधान, पर केंद्रित होगा। यह दक्षिण भारतीय मंदिर-संस्कृति और आगम-शास्त्र के अध्ययन के लिए एक अनिवार्य कृति है।
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