इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह जैन कर्म सिद्धांत पर लिखे गए छह ‘कर्मग्रंथों’ में से ‘चौथा कर्मग्रंथ’ है, जिसकी रचना आचार्य देवेन्द्रसूरि जी ने की मानी जाती है। यह ग्रंथ कर्मों की ‘बंध’ (आत्मा के साथ कर्मों का जुड़ना) की प्रक्रिया पर विशेष रूप से केंद्रित है। इसमें कर्म बंध के चार प्रकारों – प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश बंध – का बहुत ही सूक्ष्म और विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह जैन दर्शन के गंभीर और उन्नत छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी ग्रंथ है।
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