इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक जैन समाज की तत्कालीन ‘वर्तमान दशा’ पर एक चिंतनपरक और सुधारवादी कृति है, जिसे प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है। इसमें समाज में व्याप्त कुरीतियों, शैक्षिक पिछड़ेपन, और धार्मिक सिद्धांतों की अवहेलना जैसे मुद्दों पर प्रश्न उठाए गए हैं और उनके समाधान प्रस्तुत किए गए हैं। इसका उद्देश्य समाज को आत्म-निरीक्षण करने और अपनी कमजोरियों को दूर कर एक संगठित तथा प्रगतिशील समुदाय बनने के लिए प्रेरित करना है।
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