इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“आर्य मर्यादा अप्रैल-1985” आर्य समाज की एक पत्रिका का एक विशिष्ट अंक है, जो वैदिक सिद्धांतों और सामाजिक सुधारों के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित है। “आर्य मर्यादा” का अर्थ है आर्य (श्रेष्ठ) जीवन के नैतिक और सामाजिक नियम। इस अंक में संभवतः वेदों के मंत्रों की व्याख्या, महर्षि दयानंद के विचारों पर लेख, सामाजिक कुरीतियों (जैसे- जातिवाद, अंधविश्वास) पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ, और आर्य समाज की गतिविधियों से संबंधित समाचार शामिल होंगे। यह पत्रिका अपने पाठकों को एक तर्कसंगत, नैतिक और वैदिक जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करती है और उस समय के सामाजिक-धार्मिक विमर्श में आर्य समाज के दृष्टिकोण को दर्शाती है।
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