इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक विशिष्ट जैन दार्शनिक ग्रंथ है जो ‘पंच लब्धि’ अर्थात पाँच प्रकार की प्राप्तियों या शक्तियों की व्याख्या करता है। जैन सिद्धांत के अनुसार, जीव को सम्यक्त्व (सही विश्वास) प्राप्त करने से पहले इन पाँच लब्धियों – क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य, और करण – से गुजरना पड़ता है। यह पुस्तक इन सूक्ष्म और गहन अवधारणाओं का विस्तृत विश्लेषण करती है और बताती है कि कैसे एक आत्मा आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर आगे बढ़ती है। यह जैन कर्म सिद्धांत का एक उन्नत अध्ययन है।
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