इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
श्री घासीलाल व्रति के भाष्य सहित, यह पुस्तक ‘दशवैकालिक सूत्र’ का पहला भाग प्रस्तुत करती है, जो जैन आगम के ‘मूलसूत्रों’ में से एक है। इसकी रचना आर्य शय्यंभव ने अपने पुत्र के लिए की थी, ताकि वह अल्प समय में ही जैन साधु के आचार-नियमों को सीख सके। यह सूत्र जैन मुनियों की दिनचर्या, भिक्षा के नियम, अहिंसा का पालन और इंद्रिय-निग्रह जैसे विषयों पर संक्षिप्त और सारगर्भित उपदेश देता है। यह भाष्य मूल प्राकृत गाथाओं को सरल भाषा में समझाता है, जो इसे साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है।
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