इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
श्रीनाम चिंतामणि’ गौड़ीय वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना भक्त ठाकुर हरिदास के एक शिष्य ने की थी। यह पुस्तक ‘हरिनाम’ या भगवान के पवित्र नाम (विशेष रूप से ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र) के जाप की महिमा, उसके दार्शनिक आधार और साधना की विधि पर केंद्रित है। ‘चिंतामणि’ का अर्थ है ‘इच्छा पूरी करने वाली मणि’, जो यह दर्शाता है कि भगवान का नाम सभी आध्यात्मिक इच्छाओं को पूरा कर सकता है। इस ग्रंथ में नाम-अपराध (नाम जपते समय होने वाली गलतियाँ), शुद्ध नाम और नामाभास के बीच के अंतर को विस्तार से समझाया गया है। यह नाम-साधना करने वाले भक्तों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है।
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