इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह हिंदू धर्म के चार वेदों में से एक, “यजुर्वेद” की ‘शुक्ल’ शाखा की ‘माध्यन्दिन’ संहिता का मूल पाठ है। यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञ-अनुष्ठानों से संबंधित मंत्रों का संग्रह है। शुक्ल यजुर्वेद की विशेषता यह है कि इसमें मंत्र भाग (संहिता) और उसके व्याख्यात्मक ब्राह्मण भाग को स्पष्ट रूप से अलग-अलग रखा गया है। माध्यन्दिन संहिता, जिसे ‘वाजसनेयि संहिता’ भी कहते हैं, उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित है। इस पुस्तक में यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले गद्यात्मक और पद्यात्मक मंत्रों को उनके मूल स्वरूप में, वैदिक स्वरों के साथ, प्रस्तुत किया गया है। यह वैदिक कर्मकांड और साहित्य का एक मौलिक और पवित्रतम ग्रंथ है।
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