इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक इस बात को सिद्ध करने का प्रयास करती है कि ‘सोनगढ़’ (कानजी स्वामी द्वारा स्थापित आध्यात्मिक केंद्र) से प्रकाशित साहित्य जैन ‘आगम’ के ‘अनुकूल’ यानी अनुसार ही है। यह उन आलोचनाओं के जवाब में लिखी गई हो सकती है, जो सोनगढ़ के साहित्य पर परंपरा से हटने का आरोप लगाते हैं। इसमें लेखक ने आगमों के प्रमाण देकर यह दर्शाया है कि कानजी स्वामी की शिक्षाएं, विशेष रूप से निश्चय-नय पर उनका जोर, आगम-सम्मत हैं।
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