इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
वैदिक धर्म’ शीर्षक वाली यह पुस्तक वेदों पर आधारित धर्म और दर्शन के मूल सिद्धांतों का परिचय देती है। यह कृति संभवतः स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज के विचारों से प्रभावित हो सकती है, जो वेदों को ही एकमात्र प्रामाणिक धर्मग्रंथ मानते हैं। इसमें वैदिक एकेश्वरवाद, यज्ञ का महत्त्व, कर्म का सिद्धांत, पुनर्जन्म, और चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) जैसी अवधारणाओं की व्याख्या की गई होगी। इसका उद्देश्य पुराणों और बाद की परंपराओं से अलग, वेदों के ‘शुद्ध’ और मूल स्वरूप को प्रस्तुत करना है।
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