इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
अथ दुर्जन-करि-पंचानन’ का अर्थ है ‘अब दुर्जन रूपी हाथी के लिए सिंह’। यह एक खंडन-मंडनात्मक या वाद-विवाद पर आधारित ग्रंथ है। इसमें लेखक अपने विरोधियों या ‘दुर्जनों’ के तर्कों का ‘सिंह’ की तरह पराक्रम के साथ खंडन करता है और अपने सिद्धांत को स्थापित करता है। इस प्रकार की रचनाएँ मध्यकालीन भारत की शास्त्रार्थ परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीं और दार्शनिक तथा धार्मिक बहसों को दर्शाती हैं।
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