इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह शीर्षक एक प्रसिद्ध लोकोक्ति पर आधारित है, जिसका अर्थ है ‘शक्तिशाली की ही जीत होती है’। इस नाम की पुस्तक संभवतः इसी सामाजिक यथार्थ को दर्शाने वाली कहानियों, व्यंग्यात्मक लेखों या एक उपन्यास का संग्रह हो सकती है। इसमें यह दिखाया गया होगा कि कैसे समाज में ताकतवर लोग, चाहे वे धन, पद या बाहुबल से संपन्न हों, नियमों को तोड़-मरोड़कर और कमजोरों का हक छीनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। यह कृति सामाजिक अन्याय, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग पर एक तीखा कटाक्ष हो सकती है, जो पाठकों को समाज की इस कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या ‘शक्ति ही सत्य है’ का सिद्धांत ही अंतिम है।
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